बड़ी दुविधा में फंसी अम्बानी की माँ , लाख चाहते हुए भी कुछ नहीं कर पा रही है

इस संसार में माँ  और बेटे के रिश्ते से बड़ा कोई रिश्ता नहीं है |माँ के लिए अपनी हर सन्तान एक बराबर होती है और वो किसी को भी तकलीफ में नहीं देखना चाहती है| इस समय कुछ ऐसा ही हाल  हुआ है देश के सबसे अमीर इंसान की मां  कोकीलाबेन अंबानी का जो बहुत परेशान हैं। और इनकी इस परेशानी की वजह जानकर आप भी कहेंगे ये तो एक तरफ कुआं और दूसरी तरफ खाई जैसा मामला है।

दरअसल ये बात 18 नवंबर 2004 की है जब  एक टीवी चैनल पर इंटरव्यू के दौरान मुकेश अंबानी ने यह कहकर कॉर्पोरेट दुनिया और स्टॉक मार्केट की सांसें रोक दी थीं कि उनके और छोटे भाई अनिल अंबानी के बीच बंटवारे को लेकर कुछ मतभेद हैं। हालांकि फिर बात को तुरंत संभालते हुए उन्होंने कहा कि भाइयों के बीच विवाद एक घरेलू मसला है और कंपनी के कामकाज पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा।

लेकिन नुकसान हो चुका था। रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (आरआईएल) का शेयर 12 फीसदी नीचे आ गया था। इत्तेफ़ाक़ की बात है कि उस वक़्त आरआईएल अपने शेयर बाज़ार से ख़रीद रही थी!तब से लेकर आजतक दोनों भाइयों के बीच जो ‘कारोवॉर’ हुआ वह किसी फ़िल्मी किस्से से कम नहीं है। आइए, इसे सिलसिलेवार तरीके से देखते हैं।

झगड़ा और कोकिलाबेन की पीड़ा :

दरअसल, धीरुभाई अंबानी अपनी वसीयत लिखकर नहीं गए थे। 2002 में उनकी मृत्यु हुई तो कंपनियों के बंटवारे को लेकर विवाद हो गया। उस वक़्त रिलायंस इंडस्ट्रीज (आरआईएल) का सालाना टर्नओवर 80 हज़ार करोड़ के आसपास था। अंबानी परिवार की कंपनी में हिस्सेदारी लगभग 47 फीसदी की थी। मुकेश अंबानी चेयरमैन थे और अनिल अंबानी वाइस चेयरमैन। अनिल के पास कंपनी में लगभग न के बराबर अधिकार थे। बताते हैं कि उस वक़्त मुकेश ने अनिल को कंपनी बोर्ड से बाहर करने का प्लान बनाया था।

कोकिलाबेन अपने पति की मृत्यु के आघात से उबर भी नहीं पायी थीं कि दोनों भाई आपस में लड़ पड़े। कंपनी के गवर्निंग बोर्ड में मुकेश अंबानी की तूती बोलती थी और अंदरखाने की जो खबरें चल रही थीं कि उनके मुताबिक अनिल को कुछ नहीं मिलने वाला था। मां कोकिलाबेन दुविधा में पड़ गईं कि किसके साथ खड़ी हों। उन्होंने बीच का रास्ता अपनाया। दोनों बेटों के बीच मध्यस्थता की।

हालांकि, केवी कामथ ने सुझाया था कि आरआईएल और आईपीसीएल का विलय करके एक कंपनी बनायी जाए और फिर उसे दो हिस्सों में करके दोनों भाइयों में बराबर बांट दिया जाए। कहते हैं कि मुकेश ऐसा न होने देने पर अड़ गए। मुकेश अनिल से उम्र में दो साल बड़े हैं और कहा जाता है कि आरआईएल को खड़ा करने में अनिल से ज़्यादा उनका योगदान था। लिहाज़ा, आरआईएल और आईपीसीएल मुकेश के हिस्से में आयीं। रिलायंस इन्फोकॉम (कम्युनिकेशन), रिलायंस कैपिटल और रिलायंस एनर्जी की कमान अनिल के हाथों में गयी।

यहीं से दोनों भाइयों के रास्ते अलग-अलग हो गए। समझौते की एक अहम शर्त थी कि दोनों भाई 10 साल तक एक-दूसरे के कारोबारी क्षेत्र में नहीं उतरेंगे। अंग्रेजी में इसे ‘नॉन-कम्पीट एग्रीमेंट’ कहा जाता है।कहते हैं कि मां कोकिलाबेन ने समझौते के तहत मुकेश को इस बात के लिए राज़ी किया था कि आरआईएल अनिल अंबानी की कंपनी, रिलायंस एनर्जी, को बाज़ार भाव से कम कीमत पर गैस की आपूर्ति करेगी। लेकिन मुकेश अंबानी ने ऐसा करने से मना कर दिया और अनिल इस मामले को कोर्ट में ले गए।

2008 में मुकेश अंबानी ने न्यूयॉर्क टाइम्स को दिए इंटरव्यू में अनिल अंबानी पर इल्ज़ाम लगाया कि बंटवारे से पहले अनिल ने कुछ जासूसों की मदद से आरआईएल की मुखबिरी करवाई थी। बात ने तूल पकड़ लिया। झगड़ा इतना बढ़ा कि अनिल अंबानी ने बड़े भाई पर 10 हज़ार करोड़ का मानहानि का मुकदमा ठोक दियाखैर, अनिल गैस क़रार वाले मुद्दे बॉम्बे हाईकोर्ट में जीत गए तो मुकेश इस मसले को सुप्रीम कोर्ट तक गए। वहां अनिल अंबानी केस हार गए। बाद में उन्होंने मानहानि का मुकद्दमा भी वापस ले लिया था।

यह मई 2010 की बात है जब एक दिन ख़बर आई कि दोनों भाइयों के बीच 10 साल के लिए एक-दूसरे के कारोबारी क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा न करने वाला क़रार टूट गया। कॉर्पोरेट जगत ने इसे दोनों भाइयों के लिए अच्छा माना। इसे सुलह की पहली पहल माना गया। लेकिन बहुतों ने माना कि यह सुलह से ज़्यादा अनिल अंबानी की मजबूरी थी| झगड़े की वजह से हुए बंटवारे को अब 11 साल हो गए हैं। इस दौरान मुकेश अंबानी एशिया के सबसे रईस व्यक्ति बन गए हैं तो अनिल अंबानी आज अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

जानकारों के मुताबिक़ इस सबके पीछे दोनों भाइयों का मूल स्वभाव है। जहां मुकेश परदे के पीछे रहकर काम करते हैं तो वहीं अनिल सुर्खियों में रहना पसंद करते हैं। जानकार बताते हैं कि अनिल की समाजवादी पार्टी से नज़दीकी मुकेश को पसंद नहीं थी। मुकेश किसी भी प्रोजेक्ट के पीछे अपना सब कुछ झोंक देते हैं, छोटी से छोटी बात पर उनकी नज़र रहती है। अनिल फाइनेंस के क्षेत्र में दिग्गज माने जाते हैं।

कोकिलाबेन आज दोराहे पर खड़ी नज़र आती है। कहते हैं कि मुकेश को लेकर उन्हें संतुष्टि है तो अनिल को लेकर चिंता। मुकेश के हाथ तो मानो कोई पारस पत्थर लग गया है जबकि अनिल के सामने भविष्य का संकट खड़ा हो गया है। मां होने के नाते वे नाथद्वारा के मंदिर में दोनों के लिए दुआ मांगती हैं। दोनों के ही निजी उत्सव में शरीक होती हैं। वही तो हैं जो दोनों के बीच एक आख़िरी कड़ी हैं।

सट्टा बाज़ार अगर दोनों भाइयों पर दांव लगाएगा तो यकीनन मुकेश का पलड़ा भारी नज़र आता है। यही एक मां का धर्मसंकट है। एक तरफ़ तो वह जीतती हुई नज़र आती है तो दूसरी तरफ़ अपने छोटे बेटे की हार पर उसके साथ हांफती हुई खड़ी दिखाई देती है। 11 साल बाद भी एक मां की दुविधा जस की तस है।